श्रीनगर/बडगाम: जम्मू-कश्मीर की राजनीति में मंगलवार को एक बार फिर हलचल तेज हो गई। नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने बडगाम में आयोजित जनसभा के दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोला। सत्ता की राजनीति और राजनीतिक सिद्धांतों को लेकर उनकी टिप्पणी ने घाटी में नई बहस छेड़ दी है। रुहुल्लाह का संदेश साफ था कि सत्ता हासिल करने के लिए अपने सिद्धांतों और स्वाभिमान से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

रुहुल्लाह और नेशनल कॉन्फ्रेंस नेतृत्व के बीच यह टकराव अचानक नहीं हुआ है। पिछले करीब दो वर्षों से दोनों पक्षों के बीच मतभेद लगातार गहराते रहे हैं। रुहुल्लाह का आरोप है कि 2024 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने जनता से जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे और अनुच्छेद 370 की बहाली को लेकर बड़े वादे किए थे, लेकिन सरकार बनने के बाद इन मुद्दों पर अपेक्षित राजनीतिक संघर्ष नहीं किया गया।
अनुच्छेद 370 और चुनावी वादों पर नाराजगी
रुहुल्लाह लगातार सवाल उठाते रहे हैं कि जब नेशनल कॉन्फ्रेंस को जनता ने अपने घोषणापत्र के आधार पर समर्थन दिया, तो सरकार बनने के बाद उन वादों को पीछे क्यों छोड़ दिया गया? उनका कहना है कि अनुच्छेद 370 की बहाली, राजनीतिक बंदियों की रिहाई और जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकारों की सुरक्षा जैसे मुद्दे केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रहने चाहिए।
उनके मुताबिक, पार्टी नेतृत्व सत्ता में बने रहने को प्राथमिकता दे रहा है, जबकि जनता से किए गए वादों पर जवाबदेही जरूरी है। इसी नाराजगी के चलते उन्होंने पार्टी और लोकसभा की सदस्यता छोड़ने का फैसला किया था।
उमर अब्दुल्ला से क्यों बढ़ी दूरी?
रुहुल्लाह और उमर अब्दुल्ला के बीच मतभेद कई मुद्दों पर सामने आए हैं। इनमें आरक्षण नीति, अनुच्छेद 370, जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक अधिकार और सरकार की प्राथमिकताएं शामिल हैं। रुहुल्लाह का मानना है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस को अपने मूल राजनीतिक एजेंडे से पीछे नहीं हटना चाहिए।
उन्होंने पहले भी पार्टी नेतृत्व पर जनता के भरोसे और जनादेश के साथ न्याय नहीं करने का आरोप लगाया है। वहीं, इस पूरे घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर असंतोष और नेतृत्व की मुश्किलों को भी उजागर किया है।
इस्तीफे के बाद क्या होगी आगे की राह?
रुहुल्लाह ने पहले ही 3 नवंबर को नेशनल कॉन्फ्रेंस और श्रीनगर लोकसभा सीट से इस्तीफा देने की घोषणा की थी। उन्होंने संकेत दिया है कि आगे उनकी प्राथमिकता नई राजनीतिक पार्टी बनाने के बजाय सिद्धांतों और जवाबदेही पर आधारित एक संगठित जनआंदोलन खड़ा करने की होगी। उनका कहना है कि राजनीति में व्यक्ति से ज्यादा महत्व विचार, चरित्र और जनता के अधिकारों का होना चाहिए।
बडगाम की यह सभा इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि इसका असर केवल रुहुल्लाह के राजनीतिक भविष्य तक सीमित नहीं रह सकता। इससे नेशनल कॉन्फ्रेंस की अंदरूनी स्थिति और जम्मू-कश्मीर की आने वाली राजनीति की दिशा पर भी असर पड़ सकता है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि रुहुल्लाह के इस कदम के बाद पार्टी नेतृत्व क्या रुख अपनाता है और घाटी की जनता उनके नए राजनीतिक रास्ते को कितना समर्थन देती है।



