नई दिल्ली। पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर कांग्रेस अब केंद्र सरकार के खिलाफ अपना अभियान और तेज करने की तैयारी में है। इसी बीच पार्टी ने अपने शासन वाले राज्यों की परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी सतर्कता बढ़ा दी है।19 अगस्त को हुई कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक में शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। बैठक के बाद पार्टी ने अपने चार मुख्यमंत्रियों से शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस रोडमैप तैयार करने और रिपोर्ट देने को कहा। कांग्रेस के संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल के मुताबिक, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने मुख्यमंत्रियों से एक महीने के भीतर ठोस योजनाएं तैयार करने को कहा है।
BJP को घेरने से पहले राज्यों पर नजर
कांग्रेस पिछले कुछ समय से पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितता और बेरोजगारी को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार हमला कर रही है। पार्टी ने जून में ‘छात्रों की गूंज’ नाम से देशव्यापी अभियान भी शुरू किया था। अब CWC ने इस अभियान को करीब 800 शहरों तक ले जाने का फैसला किया है।ऐसे में पार्टी के सामने एक राजनीतिक चुनौती भी है। जिन मुद्दों को लेकर कांग्रेस केंद्र की सरकार को घेर रही है, अगर उसी तरह की कोई बड़ी परीक्षा संबंधी गड़बड़ी उसके अपने शासन वाले राज्य में सामने आती है, तो विपक्ष को कांग्रेस पर पलटवार करने का मौका मिल सकता है।इसी वजह से पार्टी ने अपने राज्यों की परीक्षा व्यवस्था को लेकर पहले से तैयारी शुरू करने का फैसला किया है।
चार मुख्यमंत्रियों से मांगी गई रिपोर्ट
रिपोर्टों के मुताबिक, कांग्रेस के चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों से शिक्षा और परीक्षा प्रणाली को लेकर सुधार की विस्तृत योजना तैयार करने को कहा गया है। इनमें हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना और केरल शामिल हैं।पार्टी चाहती है कि इन राज्यों में शिक्षा विशेषज्ञों के साथ मिलकर ऐसा रोडमैप तैयार किया जाए, जिसमें अकादमिक परीक्षाओं और सरकारी भर्ती परीक्षाओं के लिए स्पष्ट कैलेंडर, परीक्षा सुरक्षा और व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दे शामिल हों।
परीक्षा कैलेंडर पर विशेष जोर
परीक्षाओं की तारीखों में बार-बार बदलाव, भर्ती प्रक्रिया में देरी और परीक्षा रद्द होने से अभ्यर्थियों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। कांग्रेस ने ऐसे मामलों को कम करने के लिए अकादमिक और सरकारी परीक्षाओं का व्यवस्थित कैलेंडर तैयार करने पर जोर दिया है।इससे अभ्यर्थियों को पहले से पता रहेगा कि कौन-सी परीक्षा कब होगी और भर्ती प्रक्रिया किस समयसीमा में आगे बढ़ेगी।झारखंड में भी परीक्षा सुधार को लेकर वार्षिक परीक्षा कैलेंडर, तकनीक आधारित परीक्षा, उत्तर कुंजी और OMR शीट समय पर जारी करने तथा भर्ती प्रक्रिया में जवाबदेही बढ़ाने जैसे उपायों की घोषणा की गई है। यह कदम वहां चल रहे छात्र आंदोलन के बीच उठाया गया है।
पेपर लीक का मुद्दा पुराना, लेकिन सवाल आज भी वही
भारत में परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने का विवाद सिर्फ हाल के वर्षों तक सीमित नहीं है। 1990 के दशक से लेकर 2014 तक UPSC, CBSE, मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं, AIEEE और कई राज्य स्तरीय परीक्षाओं को लेकर पेपर लीक या परीक्षा संबंधी अनियमितताओं की खबरें सामने आती रही हैं।AIPMT/PMT, AIIMS और AIEEE जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं भी अलग-अलग समय पर विवादों में रही हैं। मध्य प्रदेश का व्यापम मामला भी मेडिकल प्रवेश और भर्ती परीक्षाओं में कथित बड़े पैमाने की अनियमितताओं के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है।
1991 से 2014 या किसी एक राजनीतिक दल के शासनकाल में कुल कितने पेपर लीक हुए, इसका कोई एक आधिकारिक और सर्वमान्य केंद्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।परीक्षाएं अलग-अलग केंद्रीय संस्थाओं, राज्य सरकारों, विश्वविद्यालयों और भर्ती बोर्डों द्वारा आयोजित की जाती हैं। पुराने मामलों का कोई एकीकृत राष्ट्रीय डेटाबेस उपलब्ध नहीं होने के कारण राजनीतिक दलों या सोशल मीडिया पर बताए गए आंकड़ों को सरकारी आंकड़ा मानना सही नहीं होगा।
2004 से 2014 तक भी सामने आए कई मामले
UPA सरकार के कार्यकाल में भी AIPMT, AIIMS, AIEEE, CBSE और अन्य परीक्षाओं को लेकर पेपर लीक या परीक्षा में गड़बड़ी की खबरें सामने आती रही थीं।इन घटनाओं को लेकर परीक्षा रद्द करने, दोबारा परीक्षा कराने और जांच जैसे कदम भी अलग-अलग मामलों में उठाए गए।हालांकि, इन सभी घटनाओं को जोड़कर यह दावा करना कि “कांग्रेस शासनकाल में इतने पेपर लीक हुए”, बिना किसी आधिकारिक समेकित रिकॉर्ड के तथ्यात्मक रूप से सही नहीं माना जा सकता।यही बात 2014 के बाद के मामलों पर भी लागू होती है।
2014 के बाद भी जारी रही परीक्षा सुरक्षा की चुनौती
2014 के बाद केंद्र और विभिन्न राज्यों में परीक्षा संबंधी विवादों के कई मामले सामने आए। NEET-UG, UGC-NET, पुलिस भर्ती, शिक्षक भर्ती और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर पेपर लीक या अनियमितताओं के आरोपों ने परीक्षा व्यवस्था की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए।The Indian Express की 2024 की एक जांच में पांच वर्षों के दौरान 15 राज्यों में भर्ती परीक्षाओं से जुड़े 41 दस्तावेजीकृत पेपर लीक मामलों की पड़ताल की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार इन मामलों से लगभग 1.4 करोड़ अभ्यर्थी प्रभावित हुए थे।इससे साफ है कि समस्या को केवल केंद्र बनाम विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई के रूप में देखने के बजाय परीक्षा व्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरी के रूप में भी देखने की जरूरत है।
कांग्रेस के लिए राजनीतिक जोखिम क्या है?
कांग्रेस पेपर लीक और युवाओं के रोजगार से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक अभियान का हिस्सा बना रही है। ऐसे में पार्टी के लिए अपने राज्यों में परीक्षा व्यवस्था को लेकर अतिरिक्त सतर्कता स्वाभाविक राजनीतिक जरूरत भी बन गई है।अगर कांग्रेस शासित किसी राज्य में परीक्षा का पेपर लीक होता है या भर्ती परीक्षा लंबे समय तक विवाद में फंसती है, तो BJP और दूसरे विपक्षी दल कांग्रेस के खिलाफ उसी मुद्दे को इस्तेमाल कर सकते हैं।यही वजह है कि पार्टी अब केवल केंद्र पर सवाल उठाने के बजाय अपने राज्यों में “मॉडल परीक्षा व्यवस्था” बनाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।
केंद्र का कानून भी लागू
पेपर लीक और सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024 लागू किया है। यह कानून 21 जून 2024 से प्रभावी हुआ और सार्वजनिक परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक, अनुचित साधनों तथा संगठित अपराध से जुड़े मामलों पर दंड का प्रावधान करता है।इस कानून का उद्देश्य परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाना है।
सवाल सिर्फ कांग्रेस या BJP का नहीं
पेपर लीक का राजनीतिक हिसाब लगाने की कोशिश लगातार होती रही है। एक पक्ष दूसरे पक्ष के शासनकाल के मामलों को गिनाता है, जबकि दूसरा पक्ष अपने कार्यकाल के मामलों का बचाव करता है।लेकिन अभ्यर्थी के लिए राजनीतिक दल से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसकी परीक्षा सुरक्षित हो और उसकी मेहनत किसी लीक या धांधली की वजह से बेकार न जाए।परीक्षा चाहे केंद्र कराए या राज्य, जिम्मेदारी अंततः उस संस्था की होती है जो परीक्षा आयोजित करती है।
अभ्यर्थियों को चाहिए सुरक्षित और समयबद्ध परीक्षा
पेपर लीक होने के बाद परीक्षा रद्द होती है तो सबसे ज्यादा नुकसान उस छात्र या नौकरी के अभ्यर्थी को होता है जिसने महीनों या वर्षों तक तैयारी की होती है। दोबारा परीक्षा का मतलब फिर से तैयारी, यात्रा, आर्थिक खर्च और मानसिक दबाव है।इसलिए परीक्षा सुधार के लिए केवल कड़े कानून पर्याप्त नहीं हैं। प्रश्नपत्र तैयार होने से लेकर उसकी छपाई, सुरक्षित भंडारण, परिवहन, परीक्षा केंद्र तक पहुंच, डिजिटल सिस्टम, CCTV निगरानी, सर्वर सुरक्षा और परीक्षा के बाद जांच—पूरी प्रक्रिया में जवाबदेही तय करनी होगी।
निष्कर्ष
कांग्रेस का पेपर लीक विरोधी अभियान अब अपने शासन वाले राज्यों की परीक्षा व्यवस्था सुधारने की दिशा में भी बढ़ रहा है। CWC के बाद चार कांग्रेस मुख्यमंत्रियों से एक महीने में शिक्षा और परीक्षा प्रणाली सुधार का रोडमैप मांगा गया है।राजनीतिक रूप से यह कांग्रेस के लिए “पहले अपने राज्यों में व्यवस्था सुधारो, फिर केंद्र पर सवाल उठाओ” वाली चुनौती भी है।लेकिन अंतिम कसौटी राजनीति नहीं, बल्कि अभ्यर्थियों का भरोसा है। सरकार कोई भी हो—पेपर लीक पर रोक, समय पर परीक्षा, पारदर्शी भर्ती और दोषियों पर कार्रवाई ही परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता तय करेगी।



