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प्रियांक खरगे का RSS से सवाल, ‘दुनिया के सबसे बड़े NGO हैं तो रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं?’

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पंजीकरण को लेकर कांग्रेस नेता और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खरगे के सवालों ने राजनीतिक बहस को फिर तेज कर दिया है। उन्होंने संघ की कानूनी स्थिति, आर्थिक पारदर्शिता और सार्वजनिक गतिविधियों को लेकर सवाल उठाए हैं। खरगे का कहना है कि यदि RSS दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन (NGO) होने का दावा करता है, तो उसे औपचारिक रूप से अपना पंजीकरण क्यों नहीं कराना चाहिए?

यह विवाद केवल संगठन के रजिस्ट्रेशन तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल भी है कि देश में बड़े स्तर पर काम करने वाले संगठनों की कानूनी स्थिति, फंडिंग और जवाबदेही को लेकर नियम क्या होने चाहिए।

प्रियांक खरगे ने क्या कहा?

नवंबर 2025 में RSS के प्रस्तावित रूट मार्च को लेकर विवाद के बीच प्रियांक खरगे ने सवाल उठाया था कि यदि संघ दुनिया का सबसे बड़ा NGO है, तो उसका पंजीकरण क्यों नहीं है। उन्होंने यह भी पूछा कि संगठन अपनी गतिविधियों और वित्तीय व्यवस्था को लेकर पारदर्शिता क्यों नहीं दिखाता।

खरगे के मुताबिक, देश में कई सामाजिक संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों को अपने पंजीकरण, वित्तीय रिकॉर्ड और फंडिंग से जुड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। ऐसे में RSS की कानूनी स्थिति को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों और रूट मार्च की अनुमति तथा उनकी जिम्मेदारी से जुड़े सवाल भी उठाए।

RSS के पंजीकरण पर क्यों उठ रहे सवाल?

RSS की स्थापना वर्ष 1925 में हुई थी। संगठन की व्यापक शाखा व्यवस्था और सामाजिक गतिविधियों के कारण उसकी कानूनी स्थिति तथा कामकाज को लेकर समय-समय पर चर्चा होती रही है।

जून 2026 में प्रियांक खरगे ने RSS प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर संगठन की कानूनी स्थिति, पदाधिकारियों, आय के स्रोतों, चंदे, खर्च और कर अनुपालन से जुड़ी जानकारी मांगी थी। उन्होंने तर्क दिया कि संगठन का व्यापक प्रभाव और सार्वजनिक गतिविधियां पारदर्शिता तथा जवाबदेही के सवालों को महत्वपूर्ण बनाती हैं।

RSS का क्या है पक्ष?

इस विवाद में RSS का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। संगठन की ओर से लंबे समय से यह तर्क दिया जाता रहा है कि उसे औपचारिक रूप से पंजीकृत होने की कानूनी बाध्यता नहीं है। RSS प्रमुख मोहन भागवत ने भी संगठन को व्यक्तियों के समूह यानी ‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’ के रूप में वर्णित किया है।

कानूनी स्थिति को समझने के लिए यह तथ्य भी अहम है कि भारत में प्रत्येक नागरिक संगठन के लिए सामान्य रूप से पंजीकरण अनिवार्य करने वाला कोई एक व्यापक कानून नहीं है। हालांकि, अलग-अलग कानूनी स्वरूप अपनाने और विशेष अधिकारों या सुविधाओं का लाभ लेने के लिए संबंधित कानूनों के तहत पंजीकरण की जरूरत हो सकती है।

राजनीतिक बहस के केंद्र में जवाबदेही

प्रियांक खरगे के सवालों ने एक बार फिर RSS की कानूनी स्थिति और वित्तीय पारदर्शिता पर बहस छेड़ी है। कांग्रेस नेता जहां संगठन से अधिक स्पष्टता की मांग कर रहे हैं, वहीं RSS का तर्क है कि औपचारिक पंजीकरण के बिना काम करना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है।

ऐसे में बहस का मुख्य मुद्दा यह है कि RSS की मौजूदा कानूनी व्यवस्था क्या है और उस पर कौन-कौन से नियम लागू होते हैं। इस सवाल का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग, संबंधित कानूनों और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर समझना जरूरी है।

Mudda Up Ka
Author: Mudda Up Ka

Mudaa UP Ka

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