
सुप्रीम कोर्ट: यूजीसी के नए समानता नियमों पर फिर होगा विचार, केंद्र सरकार कर रही समिति बनाने की तैयारी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए समानता नियमों को लेकर देशभर में जारी बहस के बीच केंद्र सरकार की ओर से नियमों की समीक्षा के लिए समिति गठित करने की तैयारी की खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट में भी इन नियमों को लेकर दोबारा विचार किए जाने का मुद्दा चर्चा में है।
यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग और अन्य आधारों पर होने वाले भेदभाव को रोकना तथा सभी विद्यार्थियों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। हालांकि, नियमों के कुछ प्रावधानों को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। ऐसे में केंद्र सरकार की ओर से समीक्षा की तैयारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा- सभी विद्यार्थियों के हितों का ध्यान रखें
5 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के नए समानता नियमों को लेकर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने बताया कि वह इन नियमों पर दोबारा विचार करने के लिए समिति गठित करने पर विचार कर रही है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र से कहा कि नियमों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए, ताकि अगली पीढ़ी के विद्यार्थियों के हितों की रक्षा हो सके। अदालत ने यह भी जोर दिया कि नियम ऐसे हों जिनसे किसी भी वर्ग के विद्यार्थियों को आशंका या असंतोष महसूस न हो।
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार नियमों की समीक्षा के लिए समिति गठित करने पर विचार कर रही है।
क्या हैं यूजीसी के नए समानता नियम?
यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और भेदभाव रोकने के उद्देश्य से ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ अधिसूचित किए थे।
इन नियमों के तहत विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centres) और समानता समितियां गठित करने का प्रावधान किया गया था। इनका उद्देश्य विद्यार्थियों के साथ होने वाले भेदभाव की शिकायतों का समाधान करना और समावेशी शैक्षणिक वातावरण तैयार करना है।
विवाद की वजह क्या है?
नए नियमों के Regulation 3(1)(c) को लेकर विवाद सामने आया। इस प्रावधान में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ जाति या जनजाति के आधार पर होने वाले भेदभाव से जुड़ी है।
नियमों को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को जाति आधारित भेदभाव के मामलों में पर्याप्त संरक्षण नहीं मिल सकता। उन्होंने नियमों के दुरुपयोग की आशंका भी जताई है।
दूसरी ओर, वंचित समुदायों के प्रतिनिधियों का कहना है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था जरूरी है।
जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने नियमों पर लगाई थी रोक
29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों को अगले आदेश तक स्थगित कर दिया था। अदालत ने कुछ प्रावधानों को अस्पष्ट बताते हुए उनके दुरुपयोग की आशंका जताई थी।
साथ ही अदालत ने निर्देश दिया था कि फिलहाल यूजीसी के 2012 के समानता नियम लागू रहेंगे, ताकि भेदभाव का सामना करने वाले विद्यार्थियों के पास शिकायत निवारण का रास्ता बना रहे।
अब आगे क्या होगा?
केंद्र सरकार की ओर से समिति गठित करने पर विचार किए जाने के बाद नियमों में संशोधन या नए प्रावधानों की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, समिति की संरचना, सदस्यों और समीक्षा की समयसीमा को लेकर अभी विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को अपने सुझावों पर विचार करने का अवसर दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार किस तरह के बदलाव प्रस्तावित करती है और अदालत में अगली सुनवाई के दौरान क्या रुख सामने आता है।
निष्कर्ष
यूजीसी के नए समानता नियमों पर केंद्र सरकार की ओर से समिति गठित करने की तैयारी उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। नियमों का उद्देश्य भेदभाव रोकना है, लेकिन उनके दायरे और लागू करने के तरीके पर विवाद बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब चुनौती यह है कि ऐसा संतुलित ढांचा तैयार किया जाए, जो भेदभाव का सामना करने वाले विद्यार्थियों को प्रभावी सुरक्षा दे और किसी भी वर्ग के साथ अन्याय या नियमों के दुरुपयोग की आशंका को कम करे।



