एएनआइ, नई दिल्ली। हमारी आंतों में कई तरह के बैक्टीरिया रहते हैं, जिनमें से अधिकतर पाचन और शरीर की सेहत के लिए जरूरी होते हैं। लेकिन कुछ खास बैक्टीरिया ऐसे भी हैं, जो लंबे समय में गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं। वैज्ञानिकों ने अब ऐसे ही एक आम आंतों के बैक्टीरिया ई. कोलाई (E. coli) के कैंसर से जुड़े प्रभाव को समझने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है।
शोधकर्ताओं ने उस प्रक्रिया की संरचनात्मक जानकारी हासिल की है, जिसके जरिए इस बैक्टीरिया की कुछ किस्में इंसानी DNA को नुकसान पहुंचा सकती हैं। यह खोज कोलन यानी कोलोरेक्टल कैंसर के विकास से जुड़े करीब दो दशक पुराने वैज्ञानिक सवाल का जवाब देने की दिशा में अहम मानी जा रही है। यह अध्ययन 4 दिसंबर 2025 को प्रतिष्ठित जर्नल Science में प्रकाशित हुआ था।

क्या है बैक्टीरिया और कैंसर के बीच संबंध?
ई. कोलाई आमतौर पर इंसानी आंतों में पाया जाने वाला बैक्टीरिया है। इसकी अधिकतर किस्में नुकसानदेह नहीं होतीं। लेकिन कुछ विशेष किस्मों में pks नाम का जीन समूह मौजूद होता है। ये बैक्टीरिया कोलिबैक्टिन (Colibactin) नाम का विषैला पदार्थ बनाते हैं, जिसे जीनोटॉक्सिन कहा जाता है।
कोलिबैक्टिन आंतों की कोशिकाओं के DNA को नुकसान पहुंचा सकता है। DNA में गड़बड़ी होने पर कोशिकाओं के सामान्य कामकाज और विभाजन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। समय के साथ ऐसी आनुवंशिक गड़बड़ियां कैंसर के विकास में योगदान दे सकती हैं।
20 साल पुरानी पहेली क्या थी?
वैज्ञानिक लंबे समय से जानते थे कि कोलिबैक्टिन DNA को नुकसान पहुंचाता है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि यह अणु DNA के साथ किस तरह जुड़कर उसे क्षतिग्रस्त करता है। नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कोलिबैक्टिन के कारण DNA की दोनों लड़ियों के बीच बनने वाले रासायनिक जुड़ाव की संरचना को सीधे समझने में सफलता पाई। इस तरह DNA को नुकसान पहुंचाने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सामने आया है।
क्या हर ई. कोलाई से कैंसर होता है?
नहीं। यह समझना बेहद जरूरी है कि ई. कोलाई की सभी किस्में कैंसर का कारण नहीं बनतीं। खतरा खास तौर पर उन किस्मों से जुड़ा है, जिनमें कोलिबैक्टिन बनाने की क्षमता होती है। शोध में इस बैक्टीरिया और कोलोरेक्टल कैंसर के बीच संबंध के प्रमाण मिले हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बैक्टीरिया की मौजूदगी से हर व्यक्ति को कैंसर हो जाएगा।
इलाज और बचाव के लिए क्यों अहम है खोज?
यह खोज भविष्य में ऐसे परीक्षण और उपचार विकसित करने में मदद कर सकती है, जिनसे बैक्टीरिया के DNA पर पड़ने वाले प्रभाव को रोका जा सके। हालांकि, अभी इसे कैंसर की जांच या इलाज का उपलब्ध तरीका नहीं माना जा सकता। वैज्ञानिकों को यह भी समझना होगा कि किन परिस्थितियों में ये बैक्टीरिया ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।
कुल मिलाकर, यह शोध बताता है कि कैंसर का खतरा केवल खानपान या जीवनशैली से ही नहीं, बल्कि आंतों में मौजूद सूक्ष्म जीवों की गतिविधियों से भी प्रभावित हो सकता है।



